शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने अहंकार बढ़ने पर कालभैरव का रौद्र रूप धारण किया था। यह अवतार ब्रह्मा जी के पांचवें सिर को काटने और ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए काशी यात्रा से जुड़ा है।
भगवान शिव शांत और सौम्य हैं, लेकिन कभी जरूरत पड़ने पर भी उनका स्वरूप बेहद भयंकर हो जाता है। शिव पुराण में बताया गया है कि जब पृथ्वी पर अहंकार बढ़ा है, तो भगवान शिव ने रौद्र रूप धारण किया है। इन्हीं में से एक अत्यंत उग्र अवतार है काल भैरव।
अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर किस कारण भगवान शिव को इतना उग्र रूप धारण करना पड़ा, तो ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको बताते हैं इसकी वजह के बारे में विस्तार से।
कालभैरव के रूप से जुड़ी कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार कौन है? इसको लेकर वार्ता हुई। इस दौरान ब्रह्मा जी ने स्वयं सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ रचनाकार बताया, लेकिन इसके बाद भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु ऋषि-मुनियों के पास पहुंचे। उन्होंने कहा कि भगवान शिव सृष्टि के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार हैं।
ऋषि-मुनियों की बात को सुनकर भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु हंसने लगे। वहीं, ब्रह्मा जी से शिव को ईर्ष्या होने लगी। महादेव ने ईर्ष्या में आकर अपशब्द कह दिए। भगवान ब्रह्मा जी के व्यवहार को महादेव को क्रोध आया और उन्होंने रौद्र रूप धारण किया। इसी रौद्र रूप से काल भैरव की उत्पत्ति हुई।
रौद्र रूप धारण करने के बाद क्रोध की ज्वाला में काल भैरव अधिक जल रहे थे। इसी दोरान उन्होंने ब्रह्मा जी का पंचम सिर काट दिया, जिससे उनको ब्रह्म हत्या का पाप लग गया।
काल भैरव ने की तीर्थ यात्रा
ऐसे में महादेव ने काल भैरव से कहा कि आपको ब्रह्म हत्या के पाप से छुटकारा पाने के लिए तीर्थ यात्रा करनी होगी। भगवान शिव के आदेश पर काल भैरव ने तीर्थ यात्रा की शुरुआत। यात्रा के आखिरी में काल भैरव काशी पहुंचे। यहां पर काल भैरव ने साधना और सत्य ज्ञान की प्राप्ति की। इससे उनको ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली। जब शिव जी ने काल भैरव को काशी में देखा, तो वे काशी में प्रकट हुए और उन्हें काशी का रक्षक बनाया।
भगवान शिव के कालभैरव रूप धारण करने की कथा का वर्णन शिव पुराण में देखने को मिलती है।

