अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर में दिए गए दान और चढ़ावे के गलत इस्तेमाल का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है।

Ram Mandir Ayodhya

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) को संबोधित यह अर्जी एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड अनूप प्रकाश अवस्थी ने दायर की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि वह सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) जैसी किसी बड़ी जांच एजेंसी से स्वतंत्र जांच का आदेश देने पर विचार करे, जो सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो।

‘लाखों लोगों की आस्था और भरोसे से जुड़ा है मामला’


यह कहते हुए कि यह मामला लाखों लोगों की आस्था और भरोसे से जुड़ा है, अर्जी में कहा गया है कि राम मंदिर से जुड़े दान के पैसे में कथित गड़बड़ी, गलत इस्तेमाल या गायब होने की हालिया खबरों ने देश और विदेश में भक्तों के बीच चिंता पैदा कर दी है।
इसमें यह भी कहा गया है कि भले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई है, लेकिन औपचारिक आपराधिक जांच और एफआईआर न होने से इस मामले पर संस्थागत प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं।

अर्जी में और क्या कहा गया?

अर्जी में कहा गया, “मैं किसी व्यक्ति, संस्था या अथॉरिटी के बारे में पहले से कोई राय नहीं बनाना चाहता। न ही मेरा मकसद ट्रस्ट पर कोई आरोप लगाना है, जिसके सदस्यों ने बहुत कीमती सेवा की है। हालांकि, आरोपों की गंभीरता और शामिल संस्था के असाधारण महत्व को देखते हुए सामान्य मानकों से कहीं ज्यादा पारदर्शिता और विश्वसनीयता की जरूरत है।”

मंदिर के महत्व का जिक्र करते हुए अर्जी में कहा गया है कि भक्तों का योगदान पवित्र चढ़ावा है जो संस्था में आस्था और भरोसे को दिखाता है और ऐसे दान से जुड़े कोई भी आरोप सामान्य वित्तीय विवाद से कहीं बड़े होते हैं।

इसमें आगे कहा गया, “श्री राम जन्मभूमि मंदिर में दिए गए चढ़ावे से जुड़ा मामला सामान्य वित्तीय गड़बड़ी के सवालों से कहीं ऊपर है। यह अनगिनत भक्तों की आस्था से जुड़ा है। यह अनगिनत भक्तों की आस्था से जुड़ा है। मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि कोई आर्थिक नुकसान हुआ है या नहीं। बल्कि मुद्दा यह है कि दुनिया के सबसे सम्मानित धार्मिक संस्थानों में से एक के प्रबंधन पर जनता का भरोसा बना हुआ है या नहीं।”

‘राज्य सरकार की बनाई गई एसआईटी नाकाफी’


इस अर्जी में कहा गया कि राज्य सरकार की बनाई एसआईटी अपने आप में नाकाफी है। इसमें यह भी तर्क दिया गया कि जब तक किसी संवैधानिक अदालत की देखरेख में जांच नहीं होती, तब तक बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को जांच की निष्पक्षता को लेकर शक बना रह सकता है।

इसने आगे दावा किया कि करोड़ों भक्तों के दान से जुड़े आरोपों के बावजूद अभी तक कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है और कहा कि आम क्रिमिनल लॉ प्रोसेस शुरू न करने से यह इंप्रेशन बन सकता है कि इस मामले को संभावित गंभीर क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट के बजाय एक एडमिनिस्ट्रेटिव गड़बड़ी के तौर पर देखा जा रहा है।

ज्ञापन में कहा गया है, “करोड़ों भक्तों द्वारा दिए गए दान से जुड़े आरोपों के बावजूद शुरुआत में ही किसी औपचारिक आपराधिक जांच का न होना इस मामले पर संस्थागत प्रतिक्रिया को लेकर सवाल खड़े करता है।”

इसमें उन रिपोर्टों का भी जिक्र किया गया जिनमें आरोप लगाया गया था कि दान प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों के पास उनकी ज्ञात आय के स्रोतों से कहीं ज्यादा संपत्ति पाई गई थी। साथ ही, यह भी साफ किया गया कि ऐसे आरोप सही हैं या गलत, यह एक सही जांच का विषय है।

न्यायिक दखल की मांग


न्यायिक दखल की मांग करते हुए इस अर्जी में सुप्रीम कोर्ट से अपील की गई कि वह अपनी निगरानी में सीबीआई जांच का आदेश दे, दान में मिले फंड को सुरक्षित रखने और उनकी सुरक्षा के लिए एक सिस्टम बनाए और मंदिर को मिले दान के कलेक्शन, अकाउंटिंग, कस्टडी, मैनेजमेंट और वितरण से जुड़े सभी पहलुओं की जांच का आदेश दे।

इसमें कहा गया है, “जिन मामलों में संस्थानों पर जनता का भरोसा दांव पर हो, वहां लाखों श्रद्धालुओं का विश्वास तभी बहाल किया जा सकता है जब जांच पूरी तरह स्वतंत्र, व्यापक और किसी भी तरह के प्रभाव, दबाव या हितों के टकराव (conflict of interest) की संभावना से मुक्त हो।”

यह मांग राम मंदिर में चढ़ावे में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच की गई है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर, राज्य सरकार ने एक एसआईटी का गठन किया है। इसमें लखनऊ के डिविजनल कमिश्नर विजय विश्वास पंत, पुलिस महानिरीक्षक (लखनऊ रेंज) किरण एस. और वित्त विभाग के विशेष सचिव नील रतन शामिल हैं।

खबरों के मुताबिक, टीम को सात दिनों के भीतर शुरुआती रिपोर्ट और 15 दिनों के भीतर अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा गया है। यह मुद्दा तब राजनीतिक रूप से गरमा गया जब समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि मंदिर के चढ़ावे से करोड़ों रुपये गायब हो गए हैं और उन्होंने न्यायिक हस्तक्षेप की मांग की।

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