यूएन मुख्यालय के बाहर तिब्बती युवक ने किया आत्मदाह : चर्चा में आया आजाद तिब्बत आंदोलन

यूएन मुख्यालय के बाहर तिब्बती युवक ने किया आत्मदाह

अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित यूएन मुख्यालय के ठीक सामने एक शख्स ने खुद को आग के हवाले कर दिया। उसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान तिब्बत की स्थिति और वहां के लोगों की मांगों की ओर आकर्षित करना बताया जा रहा है

यूएन मुख्यालय के बाहर तिब्बती युवक ने किया आत्मदाह चर्चा में आया आजाद तिब्बत आंदोलन। अमेरिका के न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के बाहर 42 साल के एक तिब्बती शख्स ने आत्मदाह कर लिया इस घटना ने एक बार फिर तिब्बत से जुड़े मुद्दों को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है। युवक ने कथित तौर पर तिब्बत की स्वतंत्रता और लोगों के अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाते हुए यह कदम उठाया। इस घटना के बाद दुनिया भर में तिब्बती आंदोलन और उससे जुड़े संघर्षों पर नई बहस शुरू हो गई है।

यूएन मुख्यालय के बाहर तिब्बती युवक के आत्मदाह का पूरा मामला

अमेरिका के न्यूयॉर्क में स्थित यूएन मुख्यालय के ठीक सामने एक शख्स ने खुद को आग के हवाले कर दिया साथ ही उसके हाथो में तिब्बत का झंडा भी था। उसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान तिब्बत की स्थिति और वहां के लोगों की मांगों की ओर आकर्षित करना बताया जा रहा है। न्यूयार्क पोस्ट के रिपोर्ट के अनुसार इस व्यक्ति की पहचान लोब्गा रंगजेन के रूप में की गयी है जिसकी उम्र लगभग 42 साल थी। यह लगभग 20 सालों से अमेरिका में रहता था। यह घटना गुरुवार शाम करीब 7 बजे मैनहट्टन के ईस्ट 43वीं स्ट्रीट और फर्स्ट एवेन्यू के पास हुई।

तिब्बत विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?

दरअसल तिब्बत का मुद्दा कई दशकों पुराना है। वर्ष 1951 में चीन ने तिब्बत पर पूरी तरह से नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इसके बाद 1959 में हुए विद्रोह के दौरान तिब्बत के आध्यात्मिक नेता दलाई लामा भारत आ गए। नतीजतन बड़ी संख्या में तिब्बती भारत सहित कई देशों में रह रहे हैं। बता दें कि 1951 में 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे, जिसके बाद चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी तिब्बत में आई थी। इस समझौते को शांतिपूर्ण संक्रमण का माध्यम बताया गया था। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नियंत्रण से पहले तिब्बत में वास्तविक स्वायत्तता थी और वहां अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था चलती थी।
निर्वासित तिब्बती समुदाय का मानना है कि उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को संरक्षित रखने के लिए उनकी स्वतंत्रता आवश्यक है। वहीं चीन तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा मानता है।

तिब्बती युवक के आत्मदाह के बाद क्या हुआ?

रंगजेन ने जैसे ही अपने आप को आग के हवाले किया वैसे ही आस पास से जा रहे लोगो ने अपने गाड़ियों के हॉर्न को बजाना शुरु कर दिया,हालांकि उसके बाद दो एमरजेंसी वर्कर ने आकर तुरंत अग्निशामक यंत्र से आग को बुझाया लेकिन तब तक रंगजेन जमीन पर गिर चुका था। उसे तुरंत पास के बेलेव्यू अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया इस घटना के तुरंत बाद पुलिस ने इलाके को पूरी तरह से घेर लिया और जांच शुरू कर दी।

तिब्बत आंदोलन में 17 वर्षों में 150 से अधिक आत्मदाह

ICT के रिपोर्ट अनुसार, 2009 से अब तक तिब्बत में चीन के दमनकारी शासन के विरोध में 150 से अधिक लोगों ने आत्मदाह किया है। इन मामलों में लगभग 127 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें छात्र, बौद्ध भिक्षु, महिलाएं और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे हैं। अधिकांश मामलों में प्रदर्शनकारियों ने तिब्बती पहचान की रक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अधिकारों की मांग उठाई थी।

इन घटनाओं ने मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि इसके बावजूद तिब्बत का मुद्दा अब भी किसी स्थायी समाधान तक नहीं पहुंच पाया है।

तिब्बत विवाद पर चीन और तिब्बती संगठनों के अलग-अलग दावे

तिब्बत विवाद को लेकर एक तरफ चीन का कहना है कि तिब्बत में आर्थिक विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में व्यापक काम हुआ है और वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया है, तो वही दूसरी ओर तिब्बती संगठन आरोप लगाते हैं कि स्थानीय संस्कृति, भाषा और धार्मिक स्वतंत्रता पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगाए जाते हैं।इन्हीं विरोधाभासी दावों के कारण तिब्बत का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में लगातार संवेदनशील बना हुआ है।

यूएन मुख्यालय के बाहर तिब्बती युवक का आत्मदाह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि उस लंबे संघर्ष की याद दिलाता है जो दशकों से जारी है। पिछले 17 वर्षों में 150 से अधिक आत्मदाह की घटनाएं यह दिखाती हैं कि तिब्बत का प्रश्न आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। एक ओर चीन विकास और स्थिरता की बात करता है, तो दूसरी ओर तिब्बती संगठन अपनी पहचान और अधिकारों की रक्षा की मांग उठाते हैं। फिलहाल आने वाले समय में यह मुद्दा वैश्विक स्तर पर चर्चा का विषय बना रह सकता है।

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