शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं। वह नई दिल्ली में होने वाले BRICS Summit 2026 में हिस्सा लेंगे। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय बैठक भी होगी। दोनों नेताओं की मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर है, क्योंकि भारत और चीन के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में तनावपूर्ण रहे हैं। गलवान घाटी में 2020 के सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंधों में काफी गिरावट आई थी। सीमा पर तनाव के साथ-साथ व्यापार, निवेश, वीजा और रणनीतिक सहयोग से जुड़े मुद्दे भी प्रभावित हुए। हालांकि, 2024 के बाद दोनों देशों ने बातचीत के जरिए रिश्तों को धीरे-धीरे सामान्य करने की कोशिश की है। अब जिनपिंग की भारत यात्रा को इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का मौका माना जा रहा है।
शी जिनपिंग 7 साल बाद भारत पहुंचेंगे
शी जिनपिंग की यह भारत यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह करीब सात साल बाद भारत आ रहे हैं। इससे पहले वह 2019 में भारत आए थे। इस बार उनकी यात्रा BRICS शिखर सम्मेलन के लिए हो रही है, लेकिन इसके साथ भारत और चीन के द्विपक्षीय संबंधों पर भी चर्चा की उम्मीद है। भारत 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS Summit की मेजबानी कर रहा है। सम्मेलन में रूस, चीन, ईरान और अन्य सदस्य देशों के नेता हिस्सा ले रहे हैं। ऐसे में मोदी और जिनपिंग की मुलाकात BRICS के मंच से अलग दोनों देशों के बीच संवाद बढ़ाने का अवसर भी दे सकती है।
सीमा विवाद पर हो सकती है अहम चर्चा
मोदी और जिनपिंग की बैठक में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा भारत-चीन सीमा विवाद हो सकता है। 2020 में गलवान घाटी की घटना के बाद दोनों देशों के बीच सैन्य तनाव बढ़ गया था। इसके बाद लंबे समय तक लद्दाख क्षेत्र में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने तैनात रहीं। हालांकि, अक्टूबर 2024 में हुए समझौते के बाद कुछ क्षेत्रों में सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके बावजूद वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर भरोसे की पूरी बहाली अभी बाकी है। दोनों नेता सीमा पर शांति, सैन्य तैनाती और भविष्य में किसी भी तनाव को रोकने के उपायों पर बात कर सकते हैं।
व्यापार घाटे और आर्थिक संबंधों पर भी नजर
भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध काफी बड़े हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापार संतुलित नहीं है। भारत चीन से बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनरी, औद्योगिक उपकरण और अन्य जरूरी उत्पाद आयात करता है। वहीं, भारत की ओर से चीन को होने वाला निर्यात तुलनात्मक रूप से कम है। इस वजह से व्यापार घाटा भारत की बड़ी चिंता बना हुआ है। बैठक में बाजार तक पहुंच, भारतीय उत्पादों के लिए चीन में अवसर, निवेश और सप्लाई चेन से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हो सकती है। भारत यह भी चाहता है कि चीन से आयात होने वाले जरूरी सामान और उपकरणों की आपूर्ति में अनावश्यक बाधाएं न आएं।

चीनी निवेश और तकनीकी सहयोग का मुद्दा
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक क्षेत्रों में चीनी निवेश को लेकर सावधानी बरती है। खासकर टेलीकॉम, डिजिटल टेक्नोलॉजी, वित्त और रक्षा से जुड़े क्षेत्रों में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि, उद्योग जगत में चीनी मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स और तकनीकी उपकरणों की जरूरत बनी हुई है। ऐसे में दोनों देशों के बीच यह चर्चा हो सकती है कि आर्थिक सहयोग कैसे बढ़ाया जाए और सुरक्षा संबंधी चिंताओं का भी समाधान निकाला जाए।
इसके अलावा, वीजा प्रक्रिया, कारोबारी यात्राओं और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों को लेकर भी बातचीत की संभावना है। हाल के समय में इन क्षेत्रों में कुछ सुधार हुए हैं, लेकिन व्यापारिक समुदाय अभी भी कई व्यावहारिक दिक्कतों का सामना कर रहा है।
पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी बात संभव
भारत-चीन संबंधों में पाकिस्तान का मुद्दा भी महत्वपूर्ण है। चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा तथा आर्थिक सहयोग लगातार बढ़ा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC भी भारत की रणनीतिक चिंताओं का विषय रहा है।
भारत चाहता है कि चीन उसकी सुरक्षा चिंताओं को समझे और ऐसे कदमों से बचे, जिनसे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ सकता है। वहीं, अरुणाचल प्रदेश और सीमा से जुड़े दूसरे मुद्दों पर चीन के दावों को लेकर भी भारत की स्थिति स्पष्ट रही है। हालांकि, यह अभी साफ नहीं है कि मोदी-जिनपिंग बैठक में इन मुद्दों पर कितनी विस्तार से चर्चा होगी।
BRICS के जरिए रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश
भारत और चीन दोनों BRICS को एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच मानते हैं। इस संगठन में आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, तकनीक और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है।
भारत BRICS को किसी एक देश या पश्चिम विरोधी गठबंधन के रूप में नहीं देखता। उसकी कोशिश है कि यह मंच विकासशील देशों की आवाज मजबूत करे और व्यापार तथा वित्तीय सहयोग के नए रास्ते खोले। वहीं, चीन BRICS के जरिए वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है। ऐसे में मोदी और जिनपिंग की बैठक में दोनों देशों के द्विपक्षीय मुद्दों के साथ-साथ BRICS की भविष्य की दिशा पर भी चर्चा हो सकती है।
क्या भारत-चीन रिश्तों में आएगा बड़ा बदलाव?
शी जिनपिंग की भारत यात्रा से दोनों देशों के संबंधों में सुधार की उम्मीद जरूर बढ़ी है, लेकिन किसी बड़े समझौते की संभावना को लेकर अभी निश्चित दावा नहीं किया जा सकता। सीमा विवाद, व्यापार घाटा, चीन-पाकिस्तान संबंध और रणनीतिक अविश्वास जैसे मुद्दे अब भी मौजूद हैं। फिर भी, नेताओं के बीच बातचीत का जारी रहना अपने आप में महत्वपूर्ण है। यदि बैठक में सीमा पर शांति, व्यापारिक बाधाओं और आर्थिक सहयोग को लेकर सकारात्मक संकेत मिलते हैं, तो भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे स्थिरता आ सकती है। फिलहाल, जिनपिंग की सात साल बाद भारत यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में एक नए अध्याय की संभावित शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, असली बदलाव बैठक के बाद सामने आने वाले फैसलों और आगे की बातचीत पर निर्भर करेगा।
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Written by Ambar Pandey

