नई दिल्ली: आरक्षण हटाओ आंदोलन और महिला आरक्षण पर सियासी संग्राम, जानिए क्या है पूरा विवाद।दरअसल देश में आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासी बहस तेज हो गई है। एक तरफ आरक्षण व्यवस्था में बदलाव की मांग को लेकर ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के बैनर तले प्रदर्शन हो रहे हैं। दूसरी तरफ महिला आरक्षण को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं। खास बात यह है कि यह बहस ऐसे समय में तेज हुई है, जब उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं।
आरक्षण हटाओ आंदोलन क्या है ?
आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़े प्रदर्शनकारी मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करने की बात से अलग, उसमें सुधार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि आरक्षण का लाभ उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जिन्हें वास्तव में इसकी जरूरत है।
प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सहायता, क्रीमी लेयर का नियम और आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा शामिल है। दिल्ली में इस मुद्दे को लेकर प्रदर्शन भी हुए हैं।
प्रदर्शनकारियों की क्या मांग है?
आरक्षण हटाओ आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को शिक्षा और रोजगार में ज्यादा मदद मिलनी चाहिए। इसके लिए मुफ्त कोचिंग, आवेदन शुल्क में राहत और शिक्षा से जुड़ी दूसरी सुविधाओं की मांग भी उठाई गई है।
कुछ प्रदर्शनकारी आरक्षित वर्गों के भीतर ‘कोटा विदिन कोटा’ की व्यवस्था की भी मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि आरक्षण का लाभ उन समुदायों तक भी पहुंचना चाहिए, जो अभी इससे अपेक्षाकृत कम लाभान्वित हुए हैं।
आरक्षण पर नेताओं के बयान से बढ़ा विवाद
आरक्षण हटाओ आंदोलन को लेकर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने आरक्षण को संवैधानिक अधिकार बताया और आंदोलन की मांगों का विरोध किया।
वहीं, केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने आरक्षण के विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है। इससे इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
अखिलेश यादव ने बीजेपी पर साधा निशाना
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण सुधार की मांग को लेकर बीजेपी पर हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘सुधार’ और ‘समीक्षा’ जैसे शब्दों की आड़ में आरक्षण खत्म करने की कोशिश हो रही है।
अखिलेश यादव ने कहा कि आरक्षण संविधान से मिला अधिकार है और इसे खत्म नहीं किया जा सकता। उनका यह बयान उत्तर प्रदेश की राजनीति में इस मुद्दे की अहमियत को दिखाता है।
मायावती और चंद्रशेखर आजाद भी विरोध में
बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने भी आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग का विरोध किया है। उन्होंने कहा कि SC, ST और OBC समुदायों को संविधान से मिले आरक्षण में बदलाव की मांग उचित नहीं है।
वहीं, आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने भी आरक्षण व्यवस्था में किसी तरह की छेड़छाड़ के खिलाफ चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि आरक्षण सामाजिक न्याय और संविधान से जुड़ा मुद्दा है।
ब्रजेश पाठक की मुलाकात से भी बढ़ा विवाद
आरक्षण हटाओ आंदोलन को लेकर विवाद तब और बढ़ गया, जब उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों से मुलाकात की। बैठक में हर्ष दुबे समेत कुछ प्रतिनिधियों ने अपनी मांगें रखीं। ब्रजेश पाठक ने कहा कि उनकी बातों को गंभीरता से सुना गया है और प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात केंद्रीय मंत्री से कराने की कोशिश की जाएगी।इस मुलाकात के बाद विपक्ष ने बीजेपी पर सवाल उठाए। विपक्षी दलों का कहना है कि बीजेपी की सरकार को आरक्षण के मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।

मोहन भागवत ने आरक्षण पर क्या कहा?
आरक्षण को लेकर RSS प्रमुख मोहन भागवत का बयान भी चर्चा में है। उन्होंने Gen-Z के साथ संवाद के दौरान कहा था कि जब तक सामाजिक असमानता मौजूद है, तब तक आरक्षण जारी रहना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा था कि आरक्षण के मुद्दे को राजनीति से अलग रखा जाना चाहिए। उनके इस बयान के बाद आरक्षण को लेकर चल रही बहस में एक और महत्वपूर्ण राजनीतिक आवाज जुड़ गई।
कांग्रेस ने महिला आरक्षण पर क्या कहा?
कांग्रेस का कहना है कि महिला आरक्षण से जुड़ा कानून सितंबर 2023 में संसद के दोनों सदनों से पारित हुआ था और राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल चुकी है।
कांग्रेस का सवाल है कि महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से क्यों जोड़ा गया है। पार्टी का कहना है कि सरकार को महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने में और देरी नहीं करनी चाहिए।
परिसीमन से महिला आरक्षण का क्या संबंध है?
महिला आरक्षण कानून के लागू होने को परिसीमन और जनगणना से जोड़ने को लेकर विपक्ष सवाल उठा रहा है। इसी वजह से महिला आरक्षण और परिसीमन अब एक-दूसरे से जुड़े बड़े राजनीतिक मुद्दे बन गए हैं।
दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि भविष्य के परिसीमन में लोकसभा सीटों के पुनर्गठन से उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है। सरकार दूसरी ओर इन आशंकाओं को खारिज करती रही है।
2027 चुनाव से पहले क्यों अहम है आरक्षण का मुद्दा?
उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। बीजेपी और विपक्षी दल दोनों ही अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक अपनी पहुंच मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। आरक्षण सुधार, सामाजिक न्याय, महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दे आने वाले चुनावी विमर्श में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
कुल मिलाकर, आरक्षण हटाओ आंदोलन ने देश में आरक्षण व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है। प्रदर्शनकारी मौजूदा व्यवस्था में सुधार, आर्थिक आधार पर मदद और क्रीमी लेयर जैसे मुद्दे उठा रहे हैं। दूसरी तरफ, विपक्षी दल इसे संविधान और सामाजिक न्याय से जुड़ा मुद्दा बताते हुए किसी भी बदलाव का विरोध कर रहे हैं।
इसी बीच महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच भी टकराव बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले महीनों में आरक्षण, महिला प्रतिनिधित्व और परिसीमन तीनों ही मुद्दे राजनीति के केंद्र में रह सकते है\
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