अबू सलेम को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। 1993 मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे गैंगस्टर अबू सलेम की समय से पहले रिहाई की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को खारिज कर दी। सलेम ने दलील दी थी कि भारत और पुर्तगाल के बीच हुए प्रत्यर्पण समझौते के तहत उसकी जेल की अवधि 25 साल से ज्यादा नहीं हो सकती। हालांकि, अदालत ने उसकी इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें अप्रैल 2026 में सलेम की समयपूर्व रिहाई की मांग खारिज की गई थी। इससे पहले दिसंबर 2024 में विशेष TADA अदालत ने भी उसकी रिहाई की मांग को स्वीकार नहीं किया था।
अबू सलेम ने क्या मांग की थी?
अबू सलेम की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई थी कि उसने जेल में 25 साल की अवधि लगभग पूरी कर ली है। उसका कहना था कि अंडरट्रायल के तौर पर जेल में बिताए गए समय और अच्छे आचरण के आधार पर मिली रिमिशन को भी उसकी सजा की अवधि में शामिल किया जाना चाहिए।
सलेम ने यह भी कहा था कि भारत ने पुर्तगाल से उसके प्रत्यर्पण के समय यह आश्वासन दिया था कि उसे न तो मौत की सजा दी जाएगी और न ही 25 साल से ज्यादा अवधि के लिए जेल में रखा जाएगा। इसी आधार पर उसने समय से पहले रिहाई की मांग की थी।
नवंबर 2030 में पूरी होगी 25 साल की अवधि
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के समय भारत की ओर से दिए गए 25 साल के आश्वासन की गणना किस तरह की जाए। रिपोर्टों के मुताबिक, अबू सलेम को 11 नवंबर 2005 को भारत लाया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना था कि 25 साल की अवधि नवंबर 2030 में पूरी होगी।
सलेम का तर्क था कि अंडरट्रायल अवधि और अर्जित रिमिशन को जोड़ने के बाद उसकी जेल अवधि 25 साल के करीब पहुंच चुकी है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना।
रिमिशन को लेकर क्या था विवाद?
अबू सलेम ने जेल में अच्छे व्यवहार के आधार पर मिली रिमिशन का भी हवाला दिया था। उसका कहना था कि इस रिमिशन को उसकी वास्तविक सजा की अवधि में शामिल किया जाना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने माना कि प्रत्यर्पण समझौते के तहत 25 साल की अधिकतम सीमा अपने आप में एक विशेष रियायत है। सामान्य रिमिशन के जरिए इस अवधि को और कम करना उस व्यवस्था के अनुरूप नहीं होगा। इसी आधार पर उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग को खारिज किया गया।
1993 मुंबई ब्लास्ट केस में उम्रकैद की सजा
अबू सलेम को 1993 के मुंबई सीरियल ब्लास्ट मामले में सितंबर 2017 में विशेष TADA अदालत ने दोषी ठहराया था और उम्रकैद की सजा सुनाई थी। 12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सिलसिलेवार धमाकों ने पूरे देश को झकझोर दिया था।
इसके अलावा सलेम को 1995 में मुंबई के बिल्डर प्रदीप जैन की हत्या के मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। यानी वह एक से ज्यादा गंभीर मामलों में सजा काट रहा है।

पुर्तगाल से प्रत्यर्पण के समय क्या था भारत का आश्वासन?
अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पित किया गया था। प्रत्यर्पण की प्रक्रिया के दौरान भारत की ओर से यह आश्वासन दिया गया था कि उसे मौत की सजा नहीं दी जाएगी और उसकी कैद की अवधि 25 साल से अधिक नहीं होगी।
जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि भारत सरकार को इस आश्वासन का पालन करना होगा और 25 साल की अवधि पूरी होने पर राष्ट्रपति को रिमिशन के संबंध में सलाह देने की संवैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी। हालांकि, उस समय भी सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा को सीधे कम करने या तत्काल रिहाई का आदेश नहीं दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब क्या है?
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का सीधा मतलब यह है कि अबू सलेम को अभी समय से पहले रिहाई नहीं मिलेगी। अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है।
यानी अबू सलेम की 25 साल वाली प्रत्यर्पण शर्त को नवंबर 2030 की समयसीमा के संदर्भ में देखा जा रहा है। उसकी ओर से दायर मौजूदा समयपूर्व रिहाई की याचिका अब खारिज हो चुकी है।
Written by Ambar Pandey

